Friday, December 25, 2009

ये आग किसने लगाई...

सबको अलग राज्य चाहिए, मानो राज्य न होकर पिज्जा और बर्गर हो गया, की आर्डर दिया और तुरंत पाया मुझे तो ऐसा ही नज़र आ रहा है, स्कूल में पड़ा था की 'अनेकता में एकता भारत की विशेषता', आज तक इस विरोधाभास को सत्य मानता था लेकिन अब कुछ स्वार्थियों की कुमंषा इसको परिवर्तित करने के विचार में है


चंद्रशेखर राव को तेलंगाना चाहिए, तो मायावती उत्तरप्रदेश के और टुकड़े करवाना चाहती है, मध्यप्रदेश महाकौशल मांग रहा है तो विदर्भ और गोरखालैंड की भी 'फुल-डिमांड' है कहीं भूख हड़ताल चल रही है तो कहीं कर्फ्यू लगा है और तोड़फोड़ चल रही है, हालात कुछ यूँ हैं की हर एक बयान पर प्रतिकियाएं आ रही हैं


मुख्यरूप से जो मांग परेशानी का सबब बनी हुई है वो आँध्रप्रदेश में तेलंगाना की है, तेलंगाना राष्ट्र समिति की अध्यक्ष चंद्रशेखर राव इसको लेकर आक्रामक रुख की बात कह रहे हैं जबकि केंद्र अपने बयानों पर लगातार पलती मार रहा है , हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं की राष्ट्रपति शाशन तक की बात हो रही है ,क्योंकि आन्ध्र प्रदेश विधानसभा के १०० से अधिक विधायक अपने इस्तीफे सौंप चुके हैं

और इस पूरे राजनीतिक धारावाहिक में बिना वजह पिसते जा रहे हैं आम लोग
संविधान भाषा के आधार पर राज्य-विभाजन की बात तो कहता है लेकिन ये तो हमें सोचना होगा की इसकी सीमा क्या हो,कब तक देश को टुकड़ों -टुकड़ों में बांटते रहेंगे, और कब तक अपनी मांगे मनवाने के लिए असामाजिक कृत्यों का सहारा लेते रहेंगे

Saturday, December 19, 2009

आडवाणी को वनवास,सुषमा को राज


कुछ दिनों पहले तक क्रिकेट में युवाओं को तरजीह देने की बात कही जा रही थी,कहते थे ये यंगिस्तान का समय है, उन्हें मौका दो, बुजुर्ग बहुत खेल चुके अब कुछ यही हाल राजनीति में भी चल रहा है भाजपा के तो यही हाल हैं, लगता है उनका भरोसा भी अब बुजुर्ग नेताओं से उठने लगा है,इसी का तो परिणाम है की भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में बहु-प्रतीक्षित परिवर्तन हो गया
लोक-सभा चुनावों में हार के बाद से भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व पर सवाल उठाये जा रहे थे , पार्टी की धज्जियां उड़ाने से खुद पार्टी के नेता भी नहीं बच पाए, बार-बार नेतृत्व परिवर्तन की बात कह कर लालकृष्ण आडवाणी और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह पर उंगलियाँ उठाई जा रही थी
आखिरकार आज वो दिन भी आ गया जब मन में प्रधानमंत्री बनने का अधूरा ख्वाब लिए आडवाणी ने लोक-सभा में नेता -प्रतिपक्ष का पद भी छोड़ दिया यूँ तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन इस तरह जाना होगा , ये शायद किसी को गंवारा न होगा अब ये पद सुषमा स्वराज संभालेंगी , कैसे और कब तक? ये देखना दिलचस्प होगा
इस परिवर्तन के साथ एक और परिवर्तन भी पार्टी नेतृत्व में हुआ, राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के स्थान नितिन गडकरी को ये जिम्मेदारी सौंपी गयी,गडकरी महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष हैं
कुछ इसे संघ की करामात कहता है, तो कोई इसे भाजपा के उज्जवल भविष्य के लिए जरूरी कदम बताता है, जो भी हो लेकिन ये परिवर्तन कहीं न कही वक़्त भी मांग रही दूसरी पीड़ी को नेतृत्व सौंपना एक सकारात्मक कदम ही कहा जा सकता है
हालांकि आडवाणी ने अभी सक्रिय राजनीति में रहने की बात कही है, लेकिन कब तक, ये तो वही जानें , फिलहाल उन्हें भाजपा संसदीय दल का नेता नियुक्त किया गया है
उम्मीद है ये परिवर्तन भाजपा का भला ही करें

Friday, November 6, 2009

बड़ी भारी हुई अब ये जिंदगी




अभी कुछ ही महीने पहले की तो बात है, दिल्ली की बसों में सफ़र बड़ा सस्ता और आम आदमी के माफिक  था, लेकिन कहते हैं न जब मुसीबत आती है तो चारों और से आती है, फल-सब्जियों, एवं अन्य जरूरी खाद्यानों के दाम पहले ही आम आदमी की पहुँच  से दूर हो चुके हैं , रही बची कसर इस बड़े किराए ने पूरी कर दी |
      यूँ तो हम दुनिया के शीर्ष चीनी उत्पादक देशों में से एक हैं पर तब क्या कहें जब चीनी  ही इतनी कड़वी हो चली है की सब इससे  जी चुराने लगे हैं, दाल तो पहले ही अपने तेवर दिखा चुकी है, सब्जियां भी किलो से पाव के भाव तक आ चुकी है और फल देखकर ही लोग अपने मन की संतुष्टि करने लगे हैं |
      दरअसल पिछले  कुछ महीनों में महंगाई के दानव ने लोगों को कुछ इस कदर जकड लिया है की , तमाम कोशिशों के बावजूद भी वो इससे निकल नहीं पा रहे हैं| सरकार के तमाम वादे और प्रयास इस वक़्त बुरी तरह से विफल होते नज़र आ रहे हैं |
       अब इस स्थिति में एक आम आदमी क्या करे इनके पास  मधु कोडा जैसी अंधी सम्पति तो  है  नही की जिसका इन्हें ही नहीं पता | ये रोज़ मजदूरी कर शाम की रोटी का जुगाड़ करते हैं लेकिन अब ये रोटी ही इनकी अहुंच से फिसलती दिख रही है | कोसें भी तो किसको कोसें कौन इनकी सुध लेनेवाला है, सब अपने नफे-नुक्सान का हिसाब लगा रहे हैं , सरकार कहती है हम कोशिश कर रहे हैं, जल्दी इसका समाधान होगा , लेकिन कब , इस सवाल का जवाब तो शायद खुद सरकार के पास भी नहीं है |
          दिन-ब-दिन  बढती इस महंगाई ने जिंदगी को इतना भारी बना दिया है की इसका बोझ सभी को दबाये जा रहा है |

Friday, October 2, 2009

अगर ये 'कैटल क्लास' है तो फिर ये क्या....


बड़े किस्मत वाले होंगे वो 'मवेशी' जिनको हवाई जहाज में सफर करने को मिलता है, हम तो अपनी छत्त से देखकर ही अपना मन बहला लेते हैं लेकिन एक बार उन जानवरों को देखने की बड़ी ख्वाहिश है जो, हवाई सफर करते हैं अब तक तो आपकी समझ में भी आ गया होगा की मै किसके बारे में बात कर रहा हूँ आजकल सरकार पर बचत और खर्चा कम करने का ऐसा भूत सवार है की, कभी प्रणव दा, तो कभी सोनिया गाँधी ख़ुद हवाई जहाज की साधारण कक्षा में सफर कर रहे है कुछ ऐसी ही सलाह और मंत्रियों को भी दी गई, लेकिन ये ठहरे ५ सितारा आराम के मारे , इन्हे तो हवाई जहाज की 'इकोनोमी क्लास' , 'मवेशी-घर' नज़र आती है सरकार के नए नवेले चेहरे और केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर साहब को तो कुछ ऐसा ही लगता है

पहली बार सांसद बने थरूर साहब , इससे पहले '५ सितारा' विवाद के कारन चर्चा में आ चुके हैं और अब ये विवादस्पद बयान, जनाब एक बार सोच तो लिया होता की कहाँ ये बयान दे रहे हैं भारत जहाँ पर २९ फीसदी से ऊपर गरीबी है, और कई लोगों को हवाई जहाज तो क्या एक बार का खाना भी नसीब नही होता

लगता है मंत्रीजी ने शायद कभी मुंबई लोकल या डीटीसी और ब्लूलाइन के मुसाफिरों को नही देखा , में तो यही सोच रहा हूँ की अगर हवाई यात्री मवेशी हो सकते हैं तो इन्हे क्या कहा जाएगा, जो आधे गाड़ी अन्दर और आधे बाहर होकर सफर करते है

एक हमारे विदेशमंत्री हैं, जिनके ५ सितारा मिजाज़ कुछ ऐसे हैं,की कुछ निर्दोष पेडों को इसकी बलि चड़ना पड़ा , दरअसल मंत्री जी को अपने सरकारी बंगले पर एक आलिशान 'लॉन' बनवाना है, जिसकी कीमत बेचारे पेडों को चुकानी पड़ी

अब कौन इन महानुभावों को बताये की आपको आपके आराम और सुख के लिए नहीं बल्कि लोगों की सस्मास्याओं को देखने के लिए ये पद दिया गया है, कम से कम बयानबाजी से पहले एक बार तो इनकी भावनाओं की क़द्र कर लिया कीजिये, शायद फिर अंग्रेजों की तरह 'सॉरी' न कहना पड़े

मुझे शिकायत इनको मिलने वाली सुख सुविधाओं से नहीं है बल्कि में तो इतना चाहता हूँ इसका कुछ हिस्सा उन लोगों को भी तो मिले जिनकी वजह से ये लोग वह पर हैं

Wednesday, September 30, 2009

रियलिटी के नाम पर!!!!!!


अगर आप मुझे इंडियन आइडल बनाना चाहते हैं तो वोट करें, अरे चोंकिये नही , में इंडियन आइडल में नही जा रहा हूँ और शायद ही जा पाऊं , कारण रहने दीजिये दरअसल आज कुछ बातें टेलीविजन पर रोजाना दिखने वाले रियलिटी शो की हो जाए, पिछले कुछ सालों में इनकी ऐसी बाढ आई की हर कोई इसमें बहता चला जा रहा है
जो आज मैं लिखने जा रहा हूँ , उसे लिखने का विचार कुछ समय तक मेरे मन में तक न भटका था, लेकिन क्या करुँ , मैं ख़ुद को न रोक पाया,मुद्दा ही ऐसा है, कुछ समय तक टीवी पर देखी गायकों की खोज , फ़िर वक्त आया, डांसर खोजने का, किंतु आज तो जीवनसाथी भी आपको टीवी पर मिल जायेंगे, हाँ ये जनता पर निर्भर करता है की वो किसे वोट देकर आपके गले बांधें , सुनने में कुछ अटपटा जरूर लगता है लेकिन ऐसा ही कुछ तो हो रहा है आजकल टीवी पर कभी आपको सच बोलने पर रुपए दिए जाते हैं, हाँ ये सच जरा कुछ हटके होते हैं , तो कभी मासूम बच्चों को छोड़ दिया जाता है, कुछ हस्तियों के हवाले जो उनके माँ -पिता बनकर उन्हें पालेंगे, कौन अच्छा माँ -पिता बन सकता है ये भी रियलिटी शो का हिस्सा बन चुका है अब आप ही सोचिये किस विषय पर और एक रियलिटी शो बन सकता है!!!!
आज के इस रियलिटी के बाज़ार में हमारे मूल कुछ इस कदर खोते जा रहे हैं की कभी-कभी तो चिंता होने लगती है की ये हम कहाँ जा रहे हैं जब कोई इस पर आवाज़ उठाये तो इसे "मानसिक संकीर्णता" कहा जाता है, जबकि इसे बनानेवालों , और देखने वालों , दोनों को ही मालूम है की कुछ तो गलत है आखिर इस तरह के कार्यकर्मों को फलने-फूलने किसने दिया, हमने ही तो राखी की शादी पर तालियाँ बजाई, वो हम ही थे जो "बिग बॉस" के घर पर नज़र रखे हुए थे इन्हें बनाना और दिखाना भी सही है किन्तु कुछ तो सीमाएं हों, किन विषयों पर बनायें किन पर नहीं
इन शो पर जिस तरह की भाषा प्रयोग की जाती है, वो आपको इन शो के दौरान सुनाई देने वाली 'बीप' से ही आ चल जाता होगा कुछ इसे आधुनिकता का नाम देते हैं, भाईसाहब ये किस तरह की रियलिटी है, जहाँ महिलाओं के जिस्म की अवांछित नुमाइश होती है और भद्र भाषा का इस्तेमाल होता है कुछ का कहना है की इन शो ने अमेरिका , इंग्लॅण्ड में बहुत अच्छा प्रभाव डाला है, पर ये क्यों ये भूल जाते हैं की ये इंडिया है, जहाँ की अपनी संस्कृति और सभ्यता है
जो बातें कभी परदे के पीछे या सबकी नज़रों से बचकर होते थे वो सब टीवी पर बेचीं जा रही हैं आखिर क्या हद हो इस रियलिटी की जरा सोचिये , मैं तो चला , क्या पता किसी रियलिटी शो में हिस्सा मिल जाय!!!!!!!!!!!!

Friday, September 11, 2009

माया का मुर्तिराज


किसी ने बड़ा खूब कहा है की जो दिखता है वो ही बिकता है, पर जनाब हम तो कहेंगे की दिखावे पर न जाएँ अपनी अक्ल लगायें, बात हो रही है बहिन मायावती की , माफ़ी चाहूँगा, मायावती की नही बल्कि उनकी मूर्तियों की | देखिये दुनिया में सभी को अलग -अलग तरह के शौक होता है, किसी को घोडे, गाड़ी का तो किसी को बंगलों का , बहिनजी को मूर्तियों का शौक है, खरीदने का नही, बनवाने का, पूछेंगे नही किसकी, ज़नाब इनको अपनी ही मूर्तियाँ बनवाने का शौक है, अब इसमें चौंकने वाली बात काया है, इसमें इनका भी क्या , ये तो माननीय कांशीराम जी की अन्तिम इच्छा थी, ऐसा में नही बल्कि ख़ुद मायावती ने कहा है|( इलाहबाद हाई कोर्ट में दी दलील के अनुसार)
किसी महानुभाव ने कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार पर इन मूर्तियों के निर्माण हो रहे निरर्थक व्यय को रोकने के लिए याचिका डाली, अब ये भला कौन होते हैं इसको रुकवाने वाले, भैय्या शौक है करने दो, मुख्यमंत्री हैं राज्य की हालत इनसे ज्यादा अच्छे ढंग से और भला कौन जानता होगा, इन्होने ही तो उत्तर प्रदेश के ६० से ज्यादा जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया था, तो फ़िर क्या २५० करोड़ भी तो दिए, हाँ ये अलग बात है की, अपनी मूर्तियाँ और कुछ पार्कों के लिए लगभग ५०० करोड़ का बजट इनके पास है, आख़िरशौक है, करने दो,
भूखे प्यासे गरीब किसान कहीं न कहीं से जुटा ही लेंगे, मगर सरकार का मूर्ती-निर्माण का बजट यदि कम पड़ गया तो, इसलिए इसके लिए थोड़ा ज्यादा बजट रखा है, कुछ को इसमें ही परेशानी होने लगी, में पूछता हूँ की आप क्यों परेशान होते हैं, सरकार है न फिक्र करने के लिए, और वैसे ये पार्क भी तो जनता के लिए ही हैं
ये बात पहुँची इलाहबाद हाई कोर्ट , जहाँ कोर्ट ने सभी मूर्तियों, स्मारकों और, पार्कों के निर्माण को रोकने का आदेश जारी किया, पर मजाल है किसी की काम रोक दे, अंत में जब सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई तो कुछ असर दिखा,हलाँकि ये आज की ही बात है,
लोगों को इस संसार से जाने के बाद दूसरों को उनकी याद में स्मारक और मूर्तियाँ बनाते तो खूब देखा है पर ख़ुद की मूर्तियाँ बनवाने का वाकया पहली बार दिखा, खैर अपने-अपने शौक हैं

Thursday, September 10, 2009

वाह रे कूटनीतिज्ञों !!



मुंबई पर हमले को २ माह बाद एक साल पूरा हो जाएगा, लेकिन भारत अभी भी 'अंकल अमेरिका' की पूँछ पकड़ कर उस हमले में पाकिस्तानियों के शामिल होने के सबूत पकिस्तान को दे रहा है, पर पकिस्तान है की कभी कहता है 'चीनी कम है', तो कभी 'दूध कम' होने की शिकायत कर रहा है , कभी-कभी तो ऐसा लगता है, जैसे हमला हमारे यहाँ नही उनके यहाँ हुआ है और उसमें हमारा हाथ है,सरकार का कहना है हम चाहते हैं पकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बनाया जाय , कोई मुझे ये बताये की ये भला कैसी कूटनीति है जिसमें पीड़ित को ही मुजरिम सा बना दिया है|
मुझे एक बात अभी तक समझ नही आई, हम कब तक अमेरिका की ऊँगली पकड़ कर चलते रहेंगे, पत्रिका में बड़े ही शानदार ढंग से इस बात को एक कार्टून के जरिये दर्शाया था, जिसमे भारत, अमेरिका के सामने अंकल-अंकल कह कर रो रहा है, इसमें ग़लत ही क्या था ,धरातल पर सच्चाई भी तो यही है,
अब बात कसाब की, ये देश का सबसे वीवीआईपी हो गया, महाशय को मुंबई हमले के दौरान , मौक़ा-ऐ-वारदात से पकड़ा गया है लेकिन सज़ा पाने के लिए आजतक तड़प रहा है,वो अदालत में भी अपील कर चुका है की मुझे फांसी देदो। लेकिन हमने तो कसम खाई है जब तक उस पर होने वाला खर्चा अरबों में न पहुँच जाए तब तक इसको सजा नही देंगे,अरे मै तो बताना ही भूल गया की कसाब पर लगभग ११००० पन्नों का आरोप-पत्र भी तो तैयार किया है, वो भी तो पड़ना और पढाया जाना बाकी है,
हाफिज़ सईद को रिहा कर, पाक बता ही चुका है की वो किस ढंग से काम कर रहा है, और रही बची कसर वो बार-बार भारत से भेजे गए सबूतों में नुस्ख निकाल कर बता रहा है,
हमले के दिन से आजतक रोजाना , सुबह टेलीविजन ऑन करते ही भारत के किसी न किसी मंत्री का बयान पड़ने को मिल ही जाता है, जिसमे पकिस्तान को आगाह किया जाता है, की हमारे सब्र का इम्तिहान न लिया जाय,
एक बात तो पक्की है की बयानबाजी और भाषण मै हमें कोई नही हरा सकता, हाँ उसके अमल होने की बात मत पूछिए, न जाने कब इनकी कथनी और करनी मिलेगी!!
यूँ तो हमें किसी चीज़ का सब्र नही होता, पता नही यहाँ पर इतना सब्र कैसे कर पा रहे हैं , मुझे तो लगता है इतना सब्र न किया जाय और जल्दी कुछ ऐसा एक्शन लिया जाय जो एक आम आदमी की समझ में भी आ जाए , वरना ये कूटनीति जैसा शब्द, पता नही कब से उन्हें परेशान किए जा रहा है,
अरे जागो इंडिया जागो, ..................... बातें कम काम जादा

जिन्ना का जिन्न ले उड़ा जसवंत को


मोह्ह्म्मद अली जिन्ना, ये चीज़ क्या रह होंगे, क्योंकि इनका नाम लेना ही जुर्म हो गया, भाजपा में तो कुछ ऐसा ही है,जब देखो इनके नाम पर बवाल खड़ा हो जाता है, ताज़ा मामला जसवंत सिंह की किताब से जुड़ा हुआ है, जो जिन्ना को केन्द्र में रख कर लिखी गई है|
आपकी जानकारी के लिए बतादें मुहम्मद अली जिन्ना ब्रिटिश भारत के प्रमुख नेता और मुस्लिम लीग के अध्यक्ष थे जिनके प्रयास से भारत का विभाजन हुआ और पकिस्तान की स्थापना हुई। पाकिस्तान में इन्हे क़ैद-ए-आज़म (महान नेता) और बाबा-ए-क़ौम (राष्ट्रपिता) कहा जाता है। इनकी जयंती और निधन के दिन पाकिस्तान में सरकारी छुट्टी होती है।
अब आपकी समझ में आ गया होगा की क्यों जिन्ना के नाम यहाँ उथल-पुथल हो जाती है, भारत में जिन्ना को भारत-विभाजन का मुख्य सूत्रधार समझा जाता है,
जसवंत सिंह की नव-प्रकाशित पुस्तक 'जिन्ना; भारत विभाजन के आईने में' इस बार इस बोतलबंद जिन्न को बाहर निकाल लायी, और यही जिन्न उनका पार्टी से निष्कासन का कारण बना, दरअसल पार्टी का कहना है की , पुस्तक में सरदार पटेल पर कुछ आप्पत्तिजनक आरोप लगायें गए हैं, हालांकि जसवंत सिंह ने ऐसी किसी बात के होने से साफ़ इनकार कर दिया है,जबकि कुछ इसको संघ(राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का दबाव बताते हैं, आख़िर पार्टी की डोर उनके ही हाथों में ही तो है,
जसवंत सिंह का कहना है की किताब को बिना पड़े ही भारतीय जनता पार्टी ने उन पर इतना निर्णय लिया, गौरतलब है की जसवंत सिंह पिछले ३० सालों से पार्टी के वफादार थे, जिनको निकलने में पार्टी को ३० मिनट भी नही लगे,
कुछ साल पहले लालकृष्ण आडवानी भी जिन्नाह को धर्मनिरपेक्ष कहने के चक्कर में पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी गवां चुके हैं, लेकिन उस वक्त जिन्ना की तारीफ करने वाले आडवानी भी निशब्द हैं, कारण वो ही जानें |
सिंह को पार्टी से निकालन पार्टी ने अनुशासहीनता पर कार्यवाही कही, अगर ये अनुशासहीनत है तो फ़िर जो भाषाअरुण शौरी ने पार्टी के बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ प्रयोग की, वो क्या है!!!!!!!!!!!!!!!!!!

छात्रसंघ का हुडदंग



आज़ादी के बाद देश में युवा नेतृत्व निर्माण के विचार से देश के विस्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों का प्रस्ताव लाया गया , परिणामस्वरूप कई दिग्गज नेता इससे निकले और देश की राजनीति में सक्रिय एवं अहम् भूमिका निभाई|
आज देश की आज़ादी को ६० साल हो चुके है, और छात्र राजनीति की मायने ही बदल चुके हैं, चुनाव प्रचार ऐसा की अच्छा-खासा विधायक और सांसद शर्मा जाए, गाड़ियों को लम्बी-लम्बी कतारें, ढोल-नगाडे, एक बार के लिए तो आप भी अचंभित हो जाएँ की यह छात्रसंघ चुनाव ही है न, खर्चे की बात तो पूछिए ही मत, हालांकि कुछ साल पहले खर्चे को निगरानी करने के लिए 'लिंगदोह कमिटी' ने भी कुछ दिशा निर्देश जारी किए थे जिनके मुताबिक 'किसी भी उम्मीदवार द्बारा ५००० रुपए से अधिक चुनावों में खर्च नही किया जा सकता', अब ये आपको भी मालूम है को कितना खर्चा होता होगा, जनाब आजकल तो ५००० में पूरी शराब भी नही आती, अब आप कहेंगे छात्रसंघ चुनावों में शराब का भला क्या काम, अजी इसके बिना भला कोई काम हुआ है, प्रेरणा तो और चुनावों से ही मिली है, यहाँ पर एक बात बताना भी जरूरी है को उपरोक्त कमिटी , सर्वोच्च न्यायालय के अर्न्तगत है|
अब आपको पता चल ही गया होगा को भारत को सर्वोच्च न्यायिक संस्था के आदेश को कैसी धज्जियाँ उडाई जा रही हैं, लेकिन यहाँ पर भी सभी लोकतंत्र का हवाला देकर निकल जाते हैं,
चुनाव के दिनों में जो चहल-पहल आपको कॉलेज परिसर में देखने को मिलेगी, शायद वो पूरे सालभर न मिले, छात्रनेताओं के अपने ही तर्क हैं कहते हैं, सालभर पडी करेंगें तो छात्रों को समस्याएं कब देखेंगे, ये भी तो सही है आख़िर इन्होने ही तो इन्हे चुना है, किंतु ये शायद भूल जाते हैं को विद्यालय में प्रार्थमिक कार्य शिक्षा है|
हाँ अगर कही इन्होने हुडदंग मचाया तो इन्हे कुछ कहियेगा नही, अरे भइया छात्रनेता हैं, आप इनको कैसे रोक सकते हैं
कुल मिलाकर बात ये है किये एक सोचनीय बिन्दु है कि आख़िर छात्र राजनीति में आए इस बदलाव का जिम्मेदार कौन है !!!!!!!!!

Wednesday, September 9, 2009

देश में पानी की कमी है !!!!!!!!!



मानसून आया और सब को निराश करके चला भी गया, नतीजतन देश में पानी की कमी, सूखा जैसी समस्याएं , उत्पन्न हो गई..... जरा रुकिए, पानी की कमी!!!!!!, कभी मुंबई, और दिल्ली आइये जनाब तब आप भी चौंक जायेंगे, क्योंकि जितना पानी किसी गाँव को चाहिए होता है, उससे कहीं ज्यादा तो आपको यहाँ सड़कों पर मिल जाएगा |
सावन तो बिना बरसात के निकल गया, पर सारी कसर अब निकल रही है,अब समस्या ये है की, इस बारिश का मज़ा लें या बेमतलब परेशान हों,बेमतलब इसलिए, क्योंकि सरकार को तो इसमें कोई नई बात नही दिखती, उनका तो कहना है , बारिश होगी तो परेशानी तो होगी ही
मुंबई की बारिश से तो सभी वाकिफ हैं, लेकिन जो हश्र इस बार राजधानी दिल्ली का हुआ, वो हज़म नही हुआ, क्योंकि अगले साल यही दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन कर रही है,और अगर उस वक्त ये हालत रहे तो राम ही राखे!!!!!!!!
मेरी बात मानें तो तैराकी की प्रतियोगिता , दिल्ली की सड़कों पर ही करा दी जाय , इतना पानी तो इक्कट्ठा हो ही जाता है, और एक प्रतियोगिता हो सकती है........ कौन इंडिया गेट से लाल किले तक अपनी गाड़ी में सबसे पहले पहुंचेगा, एक बार कराइए तो सही,अगर ये रेस ,क्रिकेट टेस्ट मैच से बड़ी न हुई तो कहियेगा
आपको ये कल्पनाएँ लग सकती हैं लेकिन कभी दिल्ली आयें तो सही, तब मालूम पड़ेगा की इसमें कितनी सच्चाई है, सड़कों पर जमा पानी को देखकर आप भी जरूर चौंक जायेंगे............. देश में वाकई पानी की कमी है!!!!!!!!!!!!!
अब किसको दोष दें , शासन, प्रशासन या फ़िर ख़ुद को, क्योंकि शासन- प्रशासन तो इलाज़ बाद में करेंगे पहले इस बात पर ही झगड़ने लगेंगे की गलती किसकी है, अब ये तो आपको भी पता है की इसका परिणाम क्या होता है,
हम तो सिर्फ़ दुआ कर सकते हैं , भगवान् इनको सद्बुद्धि दें ..........

वाह रे मेरे लोकतंत्र



जनता के द्वारा जनता के लिए, और न जाने क्या, लोकतंत्र को कुछ इसी ढंग से परिभाषित किया गया है, ऐसा मैने किताबों में पड़ा है, इसलिए ये कभी किताबों से बहार ही नही आ सकी , और हमने अपनी सुविधानुसार एक अलग ही परिभाषा इजात कर दी |
जिस व्यवस्था में आप अपने विचारों की अभिव्यक्ति कर सकते हैं, जैसे दीवारों , सार्वजनिक स्थलों, बस की सीटों पर, और न जाने कहाँ-कहाँ,
जिस व्यवस्था में आप शासन प्रशासन , और अन्य हुक्मरानों के ख़िलाफ़ विरोध जाता सकते हैं, जैसे अस्पताल के डॉक्टर ,इनके लिए विरोध जरूरी है, कोई मरे इन्हे क्या, कौनसा इनके घर का है कोई, और हम कौन होते हैं , ऐतराज़ जताने वाले, भैय्या लोकतंत्र है, ये तो इनका अधिकार है,
जैसे सड़कों पर तोड़फोड़, दफ्तरों में तोड़फोड़, बसों , ट्रेनों में आगज़नी, इसमें ग़लत ही क्या है, कुछ करोड़ का ही तो नुक्सान होता है, कुछ जानें ही तो जाती हैं , विरोध तो जाताना है,
एक सवाल हम सब पूछें ख़ुद से................ क्या यही लोकतंत्र माँगा था हमने!!!!!!!!
जवाब मुझे भी मालूम है और आपको भी........ हर बात के लिए सरकार या नेताओं को न कोसकर, कभी ख़ुद एक सही लोकतंत्र निर्माण का विचार करें,
और तभी होगा लोकतंत्र, जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा ............