सबको अलग राज्य चाहिए, मानो राज्य न होकर पिज्जा और बर्गर हो गया, की आर्डर दिया और तुरंत पाया मुझे तो ऐसा ही नज़र आ रहा है, स्कूल में पड़ा था की 'अनेकता में एकता भारत की विशेषता', आज तक इस विरोधाभास को सत्य मानता था लेकिन अब कुछ स्वार्थियों की कुमंषा इसको परिवर्तित करने के विचार में हैचंद्रशेखर राव को तेलंगाना चाहिए, तो मायावती उत्तरप्रदेश के और टुकड़े करवाना चाहती है, मध्यप्रदेश महाकौशल मांग रहा है तो विदर्भ और गोरखालैंड की भी 'फुल-डिमांड' है कहीं भूख हड़ताल चल रही है तो कहीं कर्फ्यू लगा है और तोड़फोड़ चल रही है, हालात कुछ यूँ हैं की हर एक बयान पर प्रतिकियाएं आ रही हैं
मुख्यरूप से जो मांग परेशानी का सबब बनी हुई है वो आँध्रप्रदेश में तेलंगाना की है, तेलंगाना राष्ट्र समिति की अध्यक्ष चंद्रशेखर राव इसको लेकर आक्रामक रुख की बात कह रहे हैं जबकि केंद्र अपने बयानों पर लगातार पलती मार रहा है , हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं की राष्ट्रपति शाशन तक की बात हो रही है ,क्योंकि आन्ध्र प्रदेश विधानसभा के १०० से अधिक विधायक अपने इस्तीफे सौंप चुके हैं
और इस पूरे राजनीतिक धारावाहिक में बिना वजह पिसते जा रहे हैं आम लोग
संविधान भाषा के आधार पर राज्य-विभाजन की बात तो कहता है लेकिन ये तो हमें सोचना होगा की इसकी सीमा क्या हो,कब तक देश को टुकड़ों -टुकड़ों में बांटते रहेंगे, और कब तक अपनी मांगे मनवाने के लिए असामाजिक कृत्यों का सहारा लेते रहेंगे








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