Friday, November 6, 2009

बड़ी भारी हुई अब ये जिंदगी




अभी कुछ ही महीने पहले की तो बात है, दिल्ली की बसों में सफ़र बड़ा सस्ता और आम आदमी के माफिक  था, लेकिन कहते हैं न जब मुसीबत आती है तो चारों और से आती है, फल-सब्जियों, एवं अन्य जरूरी खाद्यानों के दाम पहले ही आम आदमी की पहुँच  से दूर हो चुके हैं , रही बची कसर इस बड़े किराए ने पूरी कर दी |
      यूँ तो हम दुनिया के शीर्ष चीनी उत्पादक देशों में से एक हैं पर तब क्या कहें जब चीनी  ही इतनी कड़वी हो चली है की सब इससे  जी चुराने लगे हैं, दाल तो पहले ही अपने तेवर दिखा चुकी है, सब्जियां भी किलो से पाव के भाव तक आ चुकी है और फल देखकर ही लोग अपने मन की संतुष्टि करने लगे हैं |
      दरअसल पिछले  कुछ महीनों में महंगाई के दानव ने लोगों को कुछ इस कदर जकड लिया है की , तमाम कोशिशों के बावजूद भी वो इससे निकल नहीं पा रहे हैं| सरकार के तमाम वादे और प्रयास इस वक़्त बुरी तरह से विफल होते नज़र आ रहे हैं |
       अब इस स्थिति में एक आम आदमी क्या करे इनके पास  मधु कोडा जैसी अंधी सम्पति तो  है  नही की जिसका इन्हें ही नहीं पता | ये रोज़ मजदूरी कर शाम की रोटी का जुगाड़ करते हैं लेकिन अब ये रोटी ही इनकी अहुंच से फिसलती दिख रही है | कोसें भी तो किसको कोसें कौन इनकी सुध लेनेवाला है, सब अपने नफे-नुक्सान का हिसाब लगा रहे हैं , सरकार कहती है हम कोशिश कर रहे हैं, जल्दी इसका समाधान होगा , लेकिन कब , इस सवाल का जवाब तो शायद खुद सरकार के पास भी नहीं है |
          दिन-ब-दिन  बढती इस महंगाई ने जिंदगी को इतना भारी बना दिया है की इसका बोझ सभी को दबाये जा रहा है |

No comments:

Post a Comment