
किसी ने बड़ा खूब कहा है की जो दिखता है वो ही बिकता है, पर जनाब हम तो कहेंगे की दिखावे पर न जाएँ अपनी अक्ल लगायें, बात हो रही है बहिन मायावती की , माफ़ी चाहूँगा, मायावती की नही बल्कि उनकी मूर्तियों की | देखिये दुनिया में सभी को अलग -अलग तरह के शौक होता है, किसी को घोडे, गाड़ी का तो किसी को बंगलों का , बहिनजी को मूर्तियों का शौक है, खरीदने का नही, बनवाने का, पूछेंगे नही किसकी, ज़नाब इनको अपनी ही मूर्तियाँ बनवाने का शौक है, अब इसमें चौंकने वाली बात काया है, इसमें इनका भी क्या , ये तो माननीय कांशीराम जी की अन्तिम इच्छा थी, ऐसा में नही बल्कि ख़ुद मायावती ने कहा है|( इलाहबाद हाई कोर्ट में दी दलील के अनुसार)
किसी महानुभाव ने कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार पर इन मूर्तियों के निर्माण हो रहे निरर्थक व्यय को रोकने के लिए याचिका डाली, अब ये भला कौन होते हैं इसको रुकवाने वाले, भैय्या शौक है करने दो, मुख्यमंत्री हैं राज्य की हालत इनसे ज्यादा अच्छे ढंग से और भला कौन जानता होगा, इन्होने ही तो उत्तर प्रदेश के ६० से ज्यादा जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया था, तो फ़िर क्या २५० करोड़ भी तो दिए, हाँ ये अलग बात है की, अपनी मूर्तियाँ और कुछ पार्कों के लिए लगभग ५०० करोड़ का बजट इनके पास है, आख़िरशौक है, करने दो,
भूखे प्यासे गरीब किसान कहीं न कहीं से जुटा ही लेंगे, मगर सरकार का मूर्ती-निर्माण का बजट यदि कम पड़ गया तो, इसलिए इसके लिए थोड़ा ज्यादा बजट रखा है, कुछ को इसमें ही परेशानी होने लगी, में पूछता हूँ की आप क्यों परेशान होते हैं, सरकार है न फिक्र करने के लिए, और वैसे ये पार्क भी तो जनता के लिए ही हैं
ये बात पहुँची इलाहबाद हाई कोर्ट , जहाँ कोर्ट ने सभी मूर्तियों, स्मारकों और, पार्कों के निर्माण को रोकने का आदेश जारी किया, पर मजाल है किसी की काम रोक दे, अंत में जब सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई तो कुछ असर दिखा,हलाँकि ये आज की ही बात है,
लोगों को इस संसार से जाने के बाद दूसरों को उनकी याद में स्मारक और मूर्तियाँ बनाते तो खूब देखा है पर ख़ुद की मूर्तियाँ बनवाने का वाकया पहली बार दिखा, खैर अपने-अपने शौक हैं

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