
-780559.jpg)
आज़ादी के बाद देश में युवा नेतृत्व निर्माण के विचार से देश के विस्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों का प्रस्ताव लाया गया , परिणामस्वरूप कई दिग्गज नेता इससे निकले और देश की राजनीति में सक्रिय एवं अहम् भूमिका निभाई|
आज देश की आज़ादी को ६० साल हो चुके है, और छात्र राजनीति की मायने ही बदल चुके हैं, चुनाव प्रचार ऐसा की अच्छा-खासा विधायक और सांसद शर्मा जाए, गाड़ियों को लम्बी-लम्बी कतारें, ढोल-नगाडे, एक बार के लिए तो आप भी अचंभित हो जाएँ की यह छात्रसंघ चुनाव ही है न, खर्चे की बात तो पूछिए ही मत, हालांकि कुछ साल पहले खर्चे को निगरानी करने के लिए 'लिंगदोह कमिटी' ने भी कुछ दिशा निर्देश जारी किए थे जिनके मुताबिक 'किसी भी उम्मीदवार द्बारा ५००० रुपए से अधिक चुनावों में खर्च नही किया जा सकता', अब ये आपको भी मालूम है को कितना खर्चा होता होगा, जनाब आजकल तो ५००० में पूरी शराब भी नही आती, अब आप कहेंगे छात्रसंघ चुनावों में शराब का भला क्या काम, अजी इसके बिना भला कोई काम हुआ है, प्रेरणा तो और चुनावों से ही मिली है, यहाँ पर एक बात बताना भी जरूरी है को उपरोक्त कमिटी , सर्वोच्च न्यायालय के अर्न्तगत है|
अब आपको पता चल ही गया होगा को भारत को सर्वोच्च न्यायिक संस्था के आदेश को कैसी धज्जियाँ उडाई जा रही हैं, लेकिन यहाँ पर भी सभी लोकतंत्र का हवाला देकर निकल जाते हैं,
चुनाव के दिनों में जो चहल-पहल आपको कॉलेज परिसर में देखने को मिलेगी, शायद वो पूरे सालभर न मिले, छात्रनेताओं के अपने ही तर्क हैं कहते हैं, सालभर पडी करेंगें तो छात्रों को समस्याएं कब देखेंगे, ये भी तो सही है आख़िर इन्होने ही तो इन्हे चुना है, किंतु ये शायद भूल जाते हैं को विद्यालय में प्रार्थमिक कार्य शिक्षा है|
हाँ अगर कही इन्होने हुडदंग मचाया तो इन्हे कुछ कहियेगा नही, अरे भइया छात्रनेता हैं, आप इनको कैसे रोक सकते हैं
कुल मिलाकर बात ये है किये एक सोचनीय बिन्दु है कि आख़िर छात्र राजनीति में आए इस बदलाव का जिम्मेदार कौन है !!!!!!!!!

बहुत बढिया भुला , मैन आज पेली बार द्येखी यार त्यारू ब्लोग पण पढ़ी तें मन मगन ह्वैगी।
ReplyDeleteलिखिदी जा ----------------------------------