

जनता के द्वारा जनता के लिए, और न जाने क्या, लोकतंत्र को कुछ इसी ढंग से परिभाषित किया गया है, ऐसा मैने किताबों में पड़ा है, इसलिए ये कभी किताबों से बहार ही नही आ सकी , और हमने अपनी सुविधानुसार एक अलग ही परिभाषा इजात कर दी |
जिस व्यवस्था में आप अपने विचारों की अभिव्यक्ति कर सकते हैं, जैसे दीवारों , सार्वजनिक स्थलों, बस की सीटों पर, और न जाने कहाँ-कहाँ,
जिस व्यवस्था में आप शासन प्रशासन , और अन्य हुक्मरानों के ख़िलाफ़ विरोध जाता सकते हैं, जैसे अस्पताल के डॉक्टर ,इनके लिए विरोध जरूरी है, कोई मरे इन्हे क्या, कौनसा इनके घर का है कोई, और हम कौन होते हैं , ऐतराज़ जताने वाले, भैय्या लोकतंत्र है, ये तो इनका अधिकार है,
जैसे सड़कों पर तोड़फोड़, दफ्तरों में तोड़फोड़, बसों , ट्रेनों में आगज़नी, इसमें ग़लत ही क्या है, कुछ करोड़ का ही तो नुक्सान होता है, कुछ जानें ही तो जाती हैं , विरोध तो जाताना है,
एक सवाल हम सब पूछें ख़ुद से................ क्या यही लोकतंत्र माँगा था हमने!!!!!!!!
जवाब मुझे भी मालूम है और आपको भी........ हर बात के लिए सरकार या नेताओं को न कोसकर, कभी ख़ुद एक सही लोकतंत्र निर्माण का विचार करें,
और तभी होगा लोकतंत्र, जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा ............

every indian would be thinking like you then every bad thing of india would be changed
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