
मुफ्त में गरीब बच्चों को सलाह बहुत दी हैं की पढाई कर लो , कुछ बन जाओगे, पर खुद उनके लिए कुछ किया नहीं, अब इस मुफ्त की सलाह की भी ज़रुरत नहीं है, मुफ्त में शिक्षा जो बंटने लगी है आज से , आज़ादी के बाद बने भारतीय संविधान ने भारत के नागरिकों को जो अधिकार प्रदान किये थे उनमे और बढ़ोतरी हो गयी है, पहले मतदान का अधिकार, फिर सूचना का अधिकार और अब जाकर शिक्षा का अधिकार भी शामिल हो गया है | न जाने कितने बच्चों को अपनी गरीबी के चलते कभी स्कूल का मुंह तक देखना नसीब न हो पाया, न जाने कितने ही सपने गरीबी के बोझ में दफन हो गए लेकिन सरकार ने अब कुछ ऐसी कोशिश की है की ऐसे बच्चों के सपनों को पर मिल सकें और वो भी देश की मुख्य धारा से जुड़ सकें |संसद में पिछले साल ही पास हो चुके 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम' तय समय यानि १ अप्रैल २०१० से पूरे देश में लागू हो गया, इसकी औचारिक घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सभी से सहयोग की अपील की है | इस कानून के अनुसार देश में ६से १४ वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य रूप से शिखा प्रदान की जाएगी,कानून कहता है की कोई भी बच्चा अपने पड़ोस के किसी भी स्कूल में किसी भी समय दाखिला ले सकता है, और स्कूल को उसे दाखिला देना होगा | इस अधिनियम का मूल उद्देश्य देश के प्रत्येक बच्चे को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना है, जिसमे प्रत्येक बच्चा कम-से-कम आठवीं तक पद सके | इस पर होने वाले खर्च को भी केंद्र और राज्य सरकार दोनों मिलकर उठाएंगी , जिसमे केंद्र सरकार ५५ फ़ीसदी और राज्य सरकार ४५ फ़ीसदी खर्च का जिम्मा लेंगी | आंकड़े बताते हैं की इस कानून से देश के लगभग ८ करोड़ बच्चे लाभान्वित होंगे , सरकार की कोशिश तो काबिल-ऐ-तारीफ है लेकिन इस की सफलता की जिम्मेदारी देश के प्रत्येक नागरिक पर है, कोशिश हो की यह सन्देश प्रत्येक घर तक पहुंचे और हर बच्चा कम-से-कम इतनी तालीम तो हासिल कर सके की अच्छे और बुरे में फर्क जान सके| प्रधानमंत्री ने अपने सन्देश में कहा की बच्चे देश का भविष्य हैं और उज्वल भारत के लिए इनका विकास , इनकी शिक्षा बहुत जरूरी है | कानून कितना सफल हो पायेगा ये तो भविष्य की गर्त में छुपा है, लेकिन इतना तो साफ़ है की इसको सफल बनाने के लिए हर देशवासी को आगे आना होगा और स्कूल की ओर बाद चले क़दमों को मंजिल तक पहुँचाने में मदद करें |

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