
झारखण्ड विधान-सभा चुनाव के परिणामों के दिन मै एक भूल कर बैठा, मै वास्तविकता से अधिक सामना कर चुके अपने एक मित्र से शर्त लगा बैठा की झारखण्ड मै सिबू सोरेन और कांग्रेस ही सरकार बनायेंगे, भाजपा का कोई 'चांस' नहीं, लेकिन हाय रे नियति तुझे कुछ और ही मंज़ूर था , सिबू सोरेन की पंचर गाडी को भाजपा ने कुछ यूँ लिफ्ट कराया की 'गुरूजी' को सीधे गद्दी पर ही बिठा कर छोड़ा, और मुझे शर्त गंवानी पड़ी मै शर्त तो हारा पर एक बात अच्छी तरह से समझ गया कि राजनीति की गणित जितनी आसान बाहर से नज़र आती है, अन्दर से उतनी ही उलझी हुई है, यहाँ पर मुंबई जानेवाली ट्रेन बिना बताये दिल्ली पहुँच सकती है एक बात और समझा कि 'डेटोल' और 'टाइड' कितना भी दावा कर लें कि वो हर दाग आसानी से मिटा सकते हैं , पर जो बात 'समर्थन के साबुन' में है वो इनमें कहाँ , दाग कुछ यूँ मिटाता है की दाग ढूंढते रह जाओगे बड़ी घुमाफिर कर बात कर ली अब सीधी बात, झारखंड में मुख्यमंत्री बने सिबू सोरेन जिस भाजपा को कल तक दागी और भ्रष्ट नज़र आते थे आज उसी भारतीय जनता पार्टी के समर्थन की बदौलत गुरूजी राज्य के मुख्यमंत्री बन बैठे हैं, बात बस इतनी सी थी की तब वो विपक्ष में थे आज सत्ता का चक्कर है चुनाव परिणामों में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला जिस कारण १८ सीटें कब्जाने वाले गुरूजी को सीधी सौदेबाज़ी सूझी और फ़ेंक दिया एक दांव की जो मुझे मुख्यमंत्री बनाएगा उसे ही समर्थन मिलेगा , कांग्रेस को ये चाल रास नहीं आई, पर भाजपा ने मौके को लपका और कूद पड़े सत्ता में, ये भी न सोचा की वो उस व्यक्ति को व्यक्ति को समर्थन दे रहे हैं जिस पर हत्या जैसे मामले चल रहे हैं और झारखण्ड की जनता उन्हें एक बार पहले अपनी सीट से हटा भी चुकी है इस घटना ने दिखा दिया कि राजनीति किस कदर नए-नए मोड़ लेती है, ये देखने को मिला, यहाँ कोई अछूत नहीं , ये भी देखने को मिला और ये भी दिखा की राजनीति के हमाम में सब नंगे हैं

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