
दो ही दिन तो हुए थे जब भारत सरकार द्वारा रचित शब्दकोष के तीखे तीर , अमेरिकी रक्षामंत्री राबर्ट गेट्स की जुबां से पकिस्तान पर 'ड्रोन' की भांति गिरे थे ,उन्होंने कहा, "भारत के सब्र की भी सीमा है, और यदि २६/११ जैसा हमला दोहराने का प्रयास हुआ तो फिर भूल जायें की भारत फिर शालीन व्यवहार करेगा |"
ये बयान देकर गेट्स साहब पाकिस्तान चले गए, अब इस बयान पर पाकिस्तान की और से प्रतिक्रिया भी लाज़मी थी, सो गिलानी साहब, बोल बैठे की जब खुद रोज़ ही आतंक की मार झेल रहे हैं और अपने नागरिकों को ही नहीं बचा पा रहे हैं तो कैसे इस बात की गारंटी दे दें की भारत में २६/११ नहीं दोहराया जा सकता |
अब में इस बयान का पोस्टमार्टम करने बैठा तो पहले हंस पड़ा लेकिन फिर मामले की गंभीरता को देखते हुए चीर-फाड़ शुरू की, सोचने लगा ऐसा क्या सूझा पाक-प्रधानमंत्री को , जो इस तरह का बयान सार्वजनिक कर दिया, कहीं ये भारत के लिए इशारा तो नहीं था की हम तो हाथ खड़े कर चुके, अपनी सुरक्षा स्वयं करें, हमसे अब और न होगा, और न ही उम्मीद करें |
गिलानी के इस बयान की मंशा जो भी रही हो लेकिन एक बात तो साफ़ है की इस तरह के बयान से पाकिस्तान अपनी झुंझलाहट ही दिखा रहा है, और सांत्वना की आड़ में मुद्दे से विचलित करने का प्रयास कर रहा है, वरना आई.पी .एल के मुद्दे पर इतनी नौटंकी की कोई आवश्यकता ही नहीं थी,
ये जानते हुए भी आईपीएल एक निजी कार्यक्रम है और सरकार की इसमें हिस्सेदारी नहीं है, इसके बावजूद भी इसे तूल दिया गया और संबंधों को सुधारने की बजाय और अधिक ख़राब करने की कोशिश की गयी , वरना, पाकिस्तान में भारतीय चैनलों को बंद करने की बात और आईपीएल को 'ब्लैक-आउट' नहीं किया जाता |
एक गलत बयान और संबंधों में और खटास, इतना जानने के बाद भी इस तरह के असंगत एवं असंवेदी बयान देना कहाँ तक ठीक है, ये तो उन्हें भी पता होगा,
कहीं ऐसा न हो की 'अमन की आशा' ऐसे बयानों की भेंट चढ़ जाय , इसलिए जरा 'तोल-मोल के बोल'

