Saturday, January 23, 2010

खुद की गारंटी तो है नहीं, तुम्हारी कहाँ से दें


दो ही दिन तो हुए थे जब भारत सरकार द्वारा रचित शब्दकोष के तीखे तीर , अमेरिकी रक्षामंत्री राबर्ट गेट्स की जुबां से पकिस्तान पर 'ड्रोन' की भांति गिरे थे ,उन्होंने कहा, "भारत के सब्र की भी सीमा है, और यदि २६/११ जैसा हमला दोहराने का प्रयास हुआ तो फिर भूल जायें की भारत फिर शालीन व्यवहार करेगा |"
ये बयान देकर गेट्स साहब पाकिस्तान चले गए, अब इस बयान पर पाकिस्तान की और से प्रतिक्रिया भी लाज़मी थी, सो गिलानी साहब, बोल बैठे की जब खुद रोज़ ही आतंक की मार झेल रहे हैं और अपने नागरिकों को ही नहीं बचा पा रहे हैं तो कैसे इस बात की गारंटी दे दें की भारत में २६/११ नहीं दोहराया जा सकता |
अब में इस बयान का पोस्टमार्टम करने बैठा तो पहले हंस पड़ा लेकिन फिर मामले की गंभीरता को देखते हुए चीर-फाड़ शुरू की, सोचने लगा ऐसा क्या सूझा पाक-प्रधानमंत्री को , जो इस तरह का बयान सार्वजनिक कर दिया, कहीं ये भारत के लिए इशारा तो नहीं था की हम तो हाथ खड़े कर चुके, अपनी सुरक्षा स्वयं करें, हमसे अब और न होगा, और न ही उम्मीद करें |
गिलानी के इस बयान की मंशा जो भी रही हो लेकिन एक बात तो साफ़ है की इस तरह के बयान से पाकिस्तान अपनी झुंझलाहट ही दिखा रहा है, और सांत्वना की आड़ में मुद्दे से विचलित करने का प्रयास कर रहा है, वरना आई.पी .एल के मुद्दे पर इतनी नौटंकी की कोई आवश्यकता ही नहीं थी,
ये जानते हुए भी आईपीएल एक निजी कार्यक्रम है और सरकार की इसमें हिस्सेदारी नहीं है, इसके बावजूद भी इसे तूल दिया गया और संबंधों को सुधारने की बजाय और अधिक ख़राब करने की कोशिश की गयी , वरना, पाकिस्तान में भारतीय चैनलों को बंद करने की बात और आईपीएल को 'ब्लैक-आउट' नहीं किया जाता |
एक गलत बयान और संबंधों में और खटास, इतना जानने के बाद भी इस तरह के असंगत एवं असंवेदी बयान देना कहाँ तक ठीक है, ये तो उन्हें भी पता होगा,
कहीं ऐसा न हो की 'अमन की आशा' ऐसे बयानों की भेंट चढ़ जाय , इसलिए जरा 'तोल-मोल के बोल'

Friday, January 8, 2010

तो इसे राजनीति कहते हैं!!


झारखण्ड विधान-सभा चुनाव के परिणामों के दिन मै एक भूल कर बैठा, मै वास्तविकता से अधिक सामना कर चुके अपने एक मित्र से शर्त लगा बैठा की झारखण्ड मै सिबू सोरेन और कांग्रेस ही सरकार बनायेंगे, भाजपा का कोई 'चांस' नहीं, लेकिन हाय रे नियति तुझे कुछ और ही मंज़ूर था , सिबू सोरेन की पंचर गाडी को भाजपा ने कुछ यूँ लिफ्ट कराया की 'गुरूजी' को सीधे गद्दी पर ही बिठा कर छोड़ा, और मुझे शर्त गंवानी पड़ी मै शर्त तो हारा पर एक बात अच्छी तरह से समझ गया कि राजनीति की गणित जितनी आसान बाहर से नज़र आती है, अन्दर से उतनी ही उलझी हुई है, यहाँ पर मुंबई जानेवाली ट्रेन बिना बताये दिल्ली पहुँच सकती है एक बात और समझा कि 'डेटोल' और 'टाइड' कितना भी दावा कर लें कि वो हर दाग आसानी से मिटा सकते हैं , पर जो बात 'समर्थन के साबुन' में है वो इनमें कहाँ , दाग कुछ यूँ मिटाता है की दाग ढूंढते रह जाओगे बड़ी घुमाफिर कर बात कर ली अब सीधी बात, झारखंड में मुख्यमंत्री बने सिबू सोरेन जिस भाजपा को कल तक दागी और भ्रष्ट नज़र आते थे आज उसी भारतीय जनता पार्टी के समर्थन की बदौलत गुरूजी राज्य के मुख्यमंत्री बन बैठे हैं, बात बस इतनी सी थी की तब वो विपक्ष में थे आज सत्ता का चक्कर है चुनाव परिणामों में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला जिस कारण १८ सीटें कब्जाने वाले गुरूजी को सीधी सौदेबाज़ी सूझी और फ़ेंक दिया एक दांव की जो मुझे मुख्यमंत्री बनाएगा उसे ही समर्थन मिलेगा , कांग्रेस को ये चाल रास नहीं आई, पर भाजपा ने मौके को लपका और कूद पड़े सत्ता में, ये भी न सोचा की वो उस व्यक्ति को व्यक्ति को समर्थन दे रहे हैं जिस पर हत्या जैसे मामले चल रहे हैं और झारखण्ड की जनता उन्हें एक बार पहले अपनी सीट से हटा भी चुकी है इस घटना ने दिखा दिया कि राजनीति किस कदर नए-नए मोड़ लेती है, ये देखने को मिला, यहाँ कोई अछूत नहीं , ये भी देखने को मिला और ये भी दिखा की राजनीति के हमाम में सब नंगे हैं