Sunday, March 7, 2010

मैंने हॉकी का जनाज़ा निकलता देखा..


मैंने बढ़ी कोशिश की की सिर्फ संजीदा मसलों पर ही अपनी राय रखूंगा, लेकिन क्या करूँ आज में खुद को नहीं रोक पाया, विषय जो इतना संजीदा हो चुका था | बात मेरे राष्ट्रीय खेल की है, जो आई.सी.यू.में भर्ती है और जिसे अब सिर्फ दुआएं ही बचा सकती हैं |
किताबें पढ़नी शुरू की तो मालूम पड़ा हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है, वरना में तो क्रिकेट को ही सब कुछ समझ बैठा था, भला मालूम भी कैसे होता, हॉकी का शानदार दौर तो जा चूका था और क्रिकेट अपना जादू चला रहा था | कभी-कभी में सोच में रहता था की आखिर हॉकी ने ऐसा क्या किया जो इसे राष्ट्रीय खेल बना दिया गया, आखिरकार मैंने इतिहास को खंगालने की कोशिश की, और जो मुझे मालूम पड़ा उसने मुझे और ज्यादा दुखी कर दिया, दुखी होता भी क्यों न, इतिहास ने मुझे एक जादूगर से जो मिलाया , सब उसे ध्यानचंद कहते थे, और वो भारत के लिए हॉकी खेलता था, उसी का करिश्मा था की भारत १९२८ से लेकर १९५६ तक लगातार ६ ओलंपिक स्वर्ण कब्जाने में सफल रहा, आलम कुछ यूँ था की इस दर्मियान भारत ने विरोधियों पर १७८ गोल दागे और उन्हें सिर्फ ७ बार गेंद को अपने पाले में डालने दिया | इस बात पर संदेह न करें ये पूरी तरह से सत्य तथ्य हैं |
अब इतिहास से आज में आते हैं, आंकड़े लगभग बदल चुके हैं, पिछले कुछ वर्षों में हालात कुछ यूँ बिगड़े की जिस ओलंपिक में भारत की टूटी बोलती थी, वो खुद को उसे खेलने लायक ही नहीं बता सका, इस वर्ष विश्व कप भारत में चल रहा है, और सिर्फ यही एक कारण है, की भारत इसका एक हिस्सा है, हैरानी हुई न ये जानकार, लेकिन क्या करें सच्चाई ही ये है,आलम कुछ यूँ हैं की खिलाडियों को अपना मेहनताना लेने के लिए हड़ताल करनी पड़ती है, और फिल्मी सितारों को हॉकी देखने के लिए अपील करनी पड़ती है , कहते हैं 'दिल दो हॉकी को', लेकिन ऐसी नौबत क्यों आई, ये जानने जब में बैठा तो हॉकी हुक्मरानों को कोसने के अलावा कुछ और नहीं कर पाया, अपनी गलतियाँ भी नहीं छुपा पाया, की काश कभी हमने इस पर बात की होती |
जो हुआ उसे भुलाना तो मुश्किल है लेकिन आगे बदने के लिए उसे भुला होगा और हमें हॉकी को जिन्दगी देनी होगी, क्या पता कोई और ध्यानचंद आ जाये इसका बेडा पार लगाने |